अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा;
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा;
मरने की, अय दिल, और ही तदबीर कर, कि मैं;
शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ु-ए-का़तिल नहीं रहा;
वा कर दिए हैं शौक़ ने, बन्द-ए-नकाब-ए-हुस्न;
ग़ैर अज़ निगाह, अब कोई हाइल नहीं रहा;
बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर असद ;
जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा।
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा;
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा;
मरने की, अय दिल, और ही तदबीर कर, कि मैं;
शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ु-ए-का़तिल नहीं रहा;
वा कर दिए हैं शौक़ ने, बन्द-ए-नकाब-ए-हुस्न;
ग़ैर अज़ निगाह, अब कोई हाइल नहीं रहा;
बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर असद ;
जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा।
तुझको याद करके रोता है अब दीवाना तेरा;
जो ना भूल पाएगा कभी भी ठुकराना तेरा;
तुम हमें भूल जाओ शायद ये फितरत है तेरी;
मुश्किल है हमारे लिए प्यार भुलाना तेरा।
फुर्सत में करेंगे तुझसे हिसाब-ए-ज़िन्दगी;
अभी तो उलझे है खुद को सुलझाने में...
दिल ही दिल में हम तुमसे प्यार करते हैं;
हम ऐसे हैं जो मोहब्बत में जाँ निसार करते हैं;
निगाहें मिलाते हैं अक्सर लोगों से छुपाकर;
जैसे किसी गुनाह को यारो गुनाहगार करते हैं।
हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है हम दूसरों में इस तरह;
अपने किरदारों में हम लोग,फरिश्तें हो जैसे।
जुबां पे मोहर लगाना कोई बड़ी बात नहीं;
बदल सको तो बदल दो मेरे खयालों को।
पानी फेर दो इन पन्नों पर ताकि धुल जाए स्याही सारी;
ज़िन्दगी फिर से लिखने का मन होता है कभी-कभी।
बर्बादी का दोष दुश्मनों को देता रहा मैं अब तलक;
दोस्तों को भी परख लिया होता तो अच्छा होता;
यूँ तो हर मोड़ पर मिले कुछ दगाबाज लेकिन;
आस्तीन को भी झठक लिया होता तो अच्छा होता।
मोहब्बत का इशारा याद रहता है ।
हर प्यार को अपना प्यार याद रहता है ।।
दो पल जो प्यार की राहों में गुजरा हो ।
मौत तक वो नजारा याद रहता है
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते है;
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते है;
रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो;
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते है;
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो ;
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते है;
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन ;
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते है;
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग;
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते है।
कदम यूँ ही डगमगा गए रास्ते में;
वैसे संभालना हम भी जानते थे;
ठोकर भी लगी तो उसी पत्थर से;
जिसे हम अपना मानते थे।
रची है रतजगो की चाँदनी जिन की जबीनों में;
क़तील एक उम्र गुज़री है हमारी उन हसीनों में;
वो जिनके आँचलों से ज़िन्दगी तख़लीक होती है;
ढड़ाकता है हमारा दिल अभी तक उन हसीनों में;
ज़माना पारसाई की हदों से हम को ले आया;
मगर हम आज तक रुस्वा हैं अपने हमनशीनों में;
तलाश उन को हमारी तो नहीं पूछ ज़रा उन से;
वो क़ातिल जो लिये फिरते हैं ख़न्जर आस्तीनों में।
सब हसीं चेहरे धोखेबाज़ होते हैं;
इस बात का हमें पहले इल्म ना था;
अब हुआ इल्म तो रो-रो दिल कहे;
किया पहले किसी ने ऐसा जुल्म ना था।
अगर इश्क़ गुनाह है गुनाहगार है खुदा;
जिसने बनाया दिल किसी पर आने के लिए।
रोने दे आज हमको तू आँखें सुजाने दे
बाहों में ले ले और ख़ुद को भीग जाने दे
हैं जो सीने में क़ैद दरिया वो छूट जायेगा
हैं इतना दर्द के तेरा दामन भीग जायेगा
बहुत जुदा है औरोँ से....मेरे दर्द की कहानीँ , जख्म का कोई निशाँ नहीँ और दर्द की कोई इँतहा नहीँ।
जिंदगी भर दर्द से जीते रहे ..
दरिया पास था आंसुओं को पीते रहे..
कई बार सोंचा कह दू हाल-ए-दिल उससे..
पर न जाने क्यूँ हम होंठो को सीते रहे..
पलकों में आँसु और दिल में दर्द सोया है,
हँसने वालो को क्या पता, रोने वाला किस कदर रोया है,
ये तो बस वही जान सकता है मेरी तनहाई का आलम,
जिसने जिन्दगी में किसी को पाने से पहले खोया है..!!
